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रात के दो बजे, दरवाज़े पर दस्तक

Kind Frog 311@kind-frog-3113D

रात के दो बजे, दरवाज़े पर दस्तक

ये... ये आवाज़ कैसी थी? कोई है क्या? रात के दो बजे हैं... इस वक़्त कौन आएगा? मेरा तो कोई दोस्त भी जागता नहीं। हिम्मत रख, आर्यन। जो भी है, देखना तो पड़ेगा। छिपकर बैठने से क्या होगा? एक... दो... तीन... बस खोल देता हूँ। अरे! हॉप्सी? तू है? मेरी तो जान ही निकल गई थी! और मैं सोच रहा था कि पता नहीं कौन सा भूत आया है। तू तो मुझे डरा ही देगी, शैतान! अरे, तू भी डर गई थी क्या? बाहर अकेली ठंड में बैठी थी? बेचारी मेरी हॉप्सी। चल, अंदर आ जा। अब से हम दोनों साथ सोएँगे। फिर कोई आवाज़ नहीं डराएगी।

कहानियाँ#खरगोशहिन्दी

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    ये... ये आवाज़ कैसी थी? कोई है क्या? रात के दो बजे हैं... इस वक़्त कौन आएगा? मेरा तो कोई दोस्त भी जागता नहीं। हिम्मत रख, आर्यन। जो भी है, देखना तो पड़ेगा। छिपकर बैठने से क्या होगा? एक... दो... तीन... बस खोल देता हूँ। अरे! हॉप्सी? तू है? मेरी तो जान ही निकल गई थी! और मैं सोच रहा था कि पता नहीं कौन सा भूत आया है। तू तो मुझे डरा ही देगी, शैतान! अरे, तू भी डर गई थी क्या? बाहर अकेली ठंड में बैठी थी? बेचारी मेरी हॉप्सी। चल, अंदर आ जा। अब से हम दोनों साथ सोएँगे। फिर कोई आवाज़ नहीं डराएगी।